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Title:राजा विक्रमादित्य की मृत्यु कैसे हुई | vikramaditya ki kahani
Duration:06:25
Viewed:255,157
Published:01-08-2020
Source:Youtube

एक दिन उसी कुटिया में एक रात उन्हें अलौकिक प्रकाश कहीं दूर से आता मालूम पड़ा । उन्होंने ध्यान से देखा तो पता चला कि सारा प्रकाश सामने वाली पहाड़ियों से आ रहा था । इस प्रकाश के बीच उन्हें एक दमकता हुआ सुन्दर सा भवन दिखाई पड़ा । उनके मन में भवन देखने की जिज्ञासा हुई और उन्होंने माँ काली द्वारा प्रदत्त दोनों बेतालों का स्मरण किया । उनके आदेश पर दोनों बेताल उन्हें पहाड़ी पर ले आए और उनसे बोले कि वे इसके आगे नहीं जा सकते । कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि उस भवन के चारों ओर एक योगी महात्मा ने तंत्र शक्ति का घेरा डाल रखा है तथा उस भवन में उनका निवास है । उन घेरों के भीतर वही प्रवेश कर सकता है जिसका पुण्य उन योगी से अधिक हो । विक्रम ने वास्तविकता जानकर भवन की ओर कदम बढ़ा दिया । वे देखना चाहते थे कि उनका पुण्य उन योगी से अधिक है या नहीं । चलते-चलते वे भवन के प्रवेश द्वार तक आ गए । तभी एकाएक कहीं से चलकर एक अग्नि पिण्ड आया और उनके पास स्थिर हो गया । उसी समय महल के भीतर से किसी का आज्ञाभरा स्वर सुनाई पड़ा । वह अग्निपिण्ड लगभग फिसलता हुआ पीछे चला गया और प्रवेश द्वार साफ़ हो गया । विक्रम अन्दर घुसे तो वही आवाज़ उनसे उनका परिचय पूछने लगी । उन्होंने कहा कि सब कुछ साफ़-साफ़ बताया जाए नहीं तो वह आने वाले को श्राप से भस्म कर देंगे । विक्रमादित्य तब तक कक्ष में पहुँच चुके थे और उन्होंने देखा कि एक योगी उन्हें देख कर उठ खड़े हुए । उन्होंने जब उन योगी को बताया कि वे विक्रमादित्य हैं तो योगी ने... बहुत से लोग संदेह करते हैं कि ये वही विक्रमादित्य हैं जिनका वर्णन इतिहास की पुस्तकों में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के रूप में किया गया है किन्तु यह सत्य नहीं है। संदेह इसलिए उत्पन्न होता है कि ऐसी इतिहास की पुस्तकों में गलत पढ़ाया ही जा रहा है। वास्तव में विक्रमादित्य एक उपाधि है जिसे राजा भर्तहरि के भाई विक्रम ने तब धारण की जब उन्होंने भारतवर्ष की पवित्र भूमि को शकों (मध्य और पूर्वी एशियाई देशों से आयी एक बर्बर और म्लेछ जाति) से मुक्त करा लिया। शकों को भारत भूमि से खदेड़ने के बाद इन्होने 'शकारि विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की। शकारि का अर्थ है 'जो शकों का शत्रु हो' और विक्रमादित्य का तात्पर्य है 'जिसकी वीरता, भगवान सूर्य की किरणों की भाँती दिग-दिगन्त तक फैली हुई हो'। किन्तु विक्रमादित्य द्वारा खदेड़े जाने के बाद शकों ने भारतवर्ष के उत्तर पश्चिमी भाग यानी आज के अफ़ग़ानिस्तान में शरण ले ली। विक्रमादित्य से भारत वर्ष के शत्रु ऐसे थर-थर काँपते थे कि उनके जाने के कुछ सौ सालों बाद तक किसी की हिम्मत नहीं हुई इस पवित्र धरती की ओर आँख गड़ाने की। यद्यपि शक जाति गांधार में शरण ली हुई थी लेकिन उनके राजाओं की बहुत समय तक हिम्मत ही नहीं पड़ी पूर्व की तरफ आगे बढ़ने की। लेकिन फिर थोड़ा समय बीतने पर उन्होंने भारत वर्ष पर हमले शुरू कर दिए। उधर उत्तर-पूर्व और मध्य एशियाई देशों से फिर कुछ बर्बर जातियों जैसे कुषाण और हूण ने भारत वर्ष पर हमले शुरू कर दिए। इन जातियों के मनुष्यों की तुलना में, भारतवर्ष में काफी सभ्य, सुसंस्कृत और धनी लोग रहते थे। इन जातियों के आक्रमण के समय भारत एकीकृत नहीं था। किन्तु सौभाग्य से कुछ समय बाद ही, भारत के पूर्वी भाग (मगध) से गुप्त वंश का उदय हो रहा था। इसी वंश के दूसरी पीढ़ी के महान शासक समुद्रगुप्त ने इन म्लेछो को उखाड़ फेंका और लगभग पूरे भारतवर्ष को एक सूत्र में बांध दिया। किन्तु समुद्रगुप्त की पहली पत्नी (जो की दुष्ट स्वभाव की थी) का पुत्र रामगुप्त एक कमजोर चरित्र और हीन कान्ति वाले शरीर का स्वामी था। दुर्भाग्य से समुद्रगुप्त के बाद, ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते, इसी मुंहफट, बद्तमीज और कापुरुष, रामगुप्त को शासन की बागडोर सँभालने को मिली। उसके शासन काल में उन विदेशी बर्बर जातियों के राजाओं की इतनी हिम्मत बढ़ गयी की वे मथुरा तक बढ़ आये। और सन्धि की शर्तों के तौर पर मगध सम्राट को उनकी पत्नी 'ध्रुवस्वामिनी' को उनको सौंपने को कहा। संधि की शर्तों को सुनकर मगध राजदरबार में सन्नाटा पसर गया। ध्रुवस्वामिनी अद्वितीय सुंदरी थी किन्तु दुर्भाग्य से रामगुप्त की पत्नी थी। किन्तु भारतवर्ष के सौभाग्य से समुद्रगुप्त का दूसरा पुत्र, जिसका नाम चन्द्रगुप्त द्वितीय था, एक श्रेष्ठ पुरुष था। उसकी भुजाओं में इतना बल था कि उसने एक बार वन में आखेट के दौरान, एक पूर्ण वयस्क बाघ का, निहत्थे वध कर दिया था। अत्यंत अपमानजनक संधि-शर्तों को सुनने के बाद उसने स्वयं योजना बनाई। अपने 500 परम बलशाली एवं विश्वासपात्र सैनिकों को स्त्रीवेश में (हथियारों के साथ) तैयार होने को कहा और स्वयं (स्त्रीवेश में) अपनी भाभी ध्रुवस्वामिनी की जगह पालकी में बैठ गया। फिर उनका काफिला रात्रि के तीसरे प्रहर, शत्रु के खेमे में पहुँचा। अपमान की ज्वाला से भरे उन महामानवों ने फिर वहाँ जो रक्तपात मचाया, शत्रु सेना थर्रा उठी। भगवान भास्कर के उदय होने से पहले ही कालरात्रि सब शांत कर चुकी थी। किन्तु चन्द्रगुप्त का क्रोध अभी शांत नहीं हुआ था। उन्होंने शत्रु के सम्पूर्ण नाश का संकल्प लिया और इसके बाद उन्होंने समस्त विदेशी आक्रमणकरियों का संहार करते हुए उन्हें भारत भूमि से बाहर खदेड़ दिया। वायनाड से गांधार तक की भूमि को शत्रुओं से मुक्त करा लिया। अपने इस महान पौरुष पर उन्होंने प्रजा और विद्वानों की कामना को सम्मान देने के लिए उन्होंने 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की और वे चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य कहलाये। Visit our Website https://rahasyamaya.com/ Visit our Facebook Page https://www.facebook.com/Rahasyamaya-450440778485688/ #vikramaditya, #rahasyamaya,



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